आयकर कैलकुलेटर

लेखक: Henrick Yau

कैलकुलेटर

यह आयकर कैलकुलेटर एक ही आमदनी पर नई कर व्यवस्था और पुरानी कर व्यवस्था — दोनों का कर निकालकर बताता है कि आपके लिए कौन-सी सस्ती है। दोनों में इनकम टैक्स स्लैब भी अलग हैं और कटौतियों की पात्रता भी।

नई व्यवस्था डिफ़ॉल्ट है। उसमें स्टैंडर्ड डिडक्शन और धारा 87A की छूट मिलती है, पर 80C, 80D और गृह ऋण के ब्याज की कटौती नहीं। दोनों पर 4 % सेस लगता है। दरें वित्त वर्ष 2026-27 की हैं।

आपकी आमदनी

कटौतियाँ — ये सिर्फ़ पुरानी व्यवस्था में गिनी जाती हैं

दरें और सीमाएँ — वित्त वर्ष 2026-27 (बदली जा सकती हैं)

नई और पुरानी कर व्यवस्था में से कौन-सी सस्ती है

इसका कोई एक जवाब नहीं है, और यही इस सवाल की असली दिक़्क़त है। दोनों व्यवस्थाओं में इनकम टैक्स स्लैब अलग हैं और कटौतियों की पात्रता भी अलग है, इसलिए एक ही आमदनी पर दो अलग-अलग कर बनते हैं। जिनकी कटौतियाँ कम हैं, उनके लिए आमतौर पर नई कर व्यवस्था सस्ती पड़ती है; जिनका किराया ऊँचा है, गृह ऋण चल रहा है और 80C पूरी भरी हुई है, उनके लिए अक्सर पुरानी।

यह कैलकुलेटर वित्त वर्ष 2026-27 की दरों पर दोनों का आयकर एक साथ निकालकर अंतर दिखाता है। दरें आयकर विभाग की वेबसाइट incometax.gov.in पर उपलब्ध हैं।

गणना किस क्रम में होती है

  1. कुल आय जोड़ी जाती है — वेतन, ब्याज, किराया और बाकी सारी आमदनी।
  2. स्टैंडर्ड डिडक्शन घटता है — वेतनभोगी और पेंशनभोगी को नई व्यवस्था में 75 हज़ार रुपये और पुरानी में 50 हज़ार रुपये।
  3. बाकी कटौतियाँ सिर्फ़ पुरानी व्यवस्था में घटती हैं — 80C, 80D, गृह ऋण का ब्याज और HRA की छूट।
  4. स्लैब लगते हैं — रकम टुकड़ों में कटती है, पूरी आय पर एक दर नहीं लगती।
  5. धारा 87A की छूट घटती है।
  6. अधिभार — 50,00,000 रुपये से ऊपर की आय पर, सीमांत राहत के साथ।
  7. सेस — कर और अधिभार के जोड़ पर 4 %, दोनों व्यवस्थाओं में।

नई व्यवस्था में मूल छूट 4 लाख रुपये तक है, फिर 8 लाख तक 5 %, 12 लाख तक 10 %, 16 लाख तक 15 %, 20 लाख तक 20 %, 24 लाख तक 25 % और उसके ऊपर 30 %। पुरानी व्यवस्था में सिर्फ़ चार बैंड हैं और मूल छूट उम्र के साथ बदलती है।

जिस बात पर सबसे ज़्यादा बहस होती है: 12 लाख की सीमा

नई व्यवस्था में कर योग्य आय 12,00,000 रुपये तक रहने पर धारा 87A की 60 हज़ार रुपये तक की छूट पूरा कर मिटा देती है। इससे यह ग़लतफ़हमी फैल गई है कि सीमा पार करते ही पूरी आय पर भारी कर लग जाता है। ऐसा नहीं होता — पहले, स्लैब टुकड़ों में लगते हैं; दूसरे, सीमा से थोड़ा ऊपर वालों को सीमांत राहत मिलती है, जिससे कर उस अतिरिक्त कमाई से ज़्यादा नहीं हो सकता।

पुरानी व्यवस्था में यही छूट सिर्फ़ साढ़े बारह हज़ार रुपये तक और सिर्फ़ 5,00,000 रुपये तक की कर योग्य आय पर है, और उस पर सीमांत राहत नहीं मिलती। वहाँ सीमा एक रुपया पार करते ही पूरी छूट चली जाती है।

ध्यान रखने लायक़ एक और बात: 1 अप्रैल 2026 से नया आयकर अधिनियम, 2025 लागू है। गणित वही है, पर धाराओं के नंबर बदल गए हैं — जो छूट पहले धारा 87A में थी, वह अब धारा 156 में है।

आपका नंबर अलग क्यों निकल सकता है

यह तुलना सिर्फ़ सामान्य दरों पर लगने वाली आय की है। पूँजीगत लाभ अपनी अलग दरों पर कर लगते हैं और इस गणना में नहीं आते। इसी तरह कृषि आय का जोड़, पिछले वर्षों का बकाया वेतन मिलने पर मिलने वाली राहत, विदेश में चुकाए गए कर का क्रेडिट और घाटे का समायोजन भी यहाँ शामिल नहीं हैं। वरिष्ठ नागरिकों की ब्याज आय पर मिलने वाली अलग छूट भी अपने-आप नहीं जुड़ती।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या मैं हर साल कर व्यवस्था बदल सकता हूँ? वेतनभोगी के पास हर साल रिटर्न भरते समय चुनने का विकल्प रहता है। कारोबार या पेशे से आय वालों के लिए यह छूट सीमित है — वे पुरानी व्यवस्था में लौटकर दोबारा आसानी से नई में नहीं जा सकते।

क्या नई व्यवस्था में कोई कटौती नहीं मिलती? स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है और नियोक्ता का पेंशन योजना में योगदान भी। जो नहीं मिलता वह है 80C, 80D, गृह ऋण के ब्याज की कटौती और HRA की छूट — यानी वे सारी कटौतियाँ जिनके लिए लोग अलग से निवेश करते हैं।

सेस किस पर लगता है? स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेस कर और अधिभार के जोड़ पर 4 % लगता है, आय पर नहीं। यह दोनों व्यवस्थाओं में एक जैसा है और इसमें कोई छूट नहीं मिलती।

अधिभार कब से लगता है? कर योग्य आय 50,00,000 रुपये पार करने पर, और वह पूरी कर राशि पर एक ही दर से लगता है। सीमा के ठीक ऊपर वालों को सीमांत राहत मिलती है। सबसे ऊँची दर पुरानी व्यवस्था में नई व्यवस्था से ज़्यादा है।